आयुर्वेदीय क्रिया शारीर | Ayurvediya Kiriya Sharir pdf
आयुर्वेदिक क्रिया शरीर | Ayorvedik Kriya Sharir Book/Pustak Pdf Free Download
Kriya Sharir Book PDF free download in Hindi
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पुस्तक का एक मशीनी अंश
'धातु' शब्दका मुख्य प्रयोग रस-रक्तादिके लिए होता है, क्योंकि वे दोपों और मलोकी अपेक्षया शरीरका धारण अर्थात् उपादान रूपसे निर्माण विशेषतया करते हैं। तथापि, यत्किंचित धारक होनेसे दोपों और मलोंको मी आयुर्वेदमें 'धातु' कहा जाता है। देखिये – धातवो हि देहधारणसामर्थ्यात् सर्वे दोपादय उच्यन्ते – अ० स० सू० १० में इन्दुमति ने कहा है ।
परन्तु इनकी यह सजा गौण ही है। इसी प्रकार शरीरको मुख्यतः दूषित ( विकृत, रुग्ण) करने वाले होनेसे वातादिके लिए 'दोष' शब्दका मुख्य व्यवहार होता है। परन्तु धातु और मल मी दोप-दूषित होकर परोक्षरीत्या शरीरको दूपित करते हैं। अतः गौण रूपसे उन्हें भी 'दोष' कहनेका प्रचार है। एव दोपों और धातुमॉकी अपेक्षया अधिक मात्रामें मल-रूप अर्थात् अपने-अपने छिद्रोंसे बाहर फेंके जाने योग्य होनेसे पुरीषादिको ही मुख्यत्वेन 'मल' नाम दिया गया है। इन्हें मल इसलिये भी कहते हैं कि ये शरीरमें वृद्धिको प्राप्त हो तो इसे विशेष रूपसे मलिन करते हैं। इन्हें मल कहनेका यह कारण भी है कि ये आहारके निसार अंश ( मल ) हैं। देखिये – मलिनीकरणादाहारमलत्वान्मलाः १ - अ० सं० सू० १० १ उधर, दोप तथा धातु भी वृद्धिको प्राप्त होकर मल-रूप ( बाहर निक्षेप्य) होते तथा शरीरको मलिन करते ही हैं, अतः उन्हें भी कमी-कभी 'मेल' कहा जाता है, परन्तु उनका यह नाम गौण है ।
'धातु' शब्द उक्त प्रकारसे दोष-धातु-मले तीनका वाचक होनेसे यहाँ उसका वैसा ही
अर्थ लिया है ।
४–यह वाक्य ग्रहणी चिकित्सा प्रकरणमें आया है। यहाँ इसका अर्थ करते हुए प्रासङ्गिक सिद्धान्त मात्र लिया है, सम्पूर्ण वचनका अर्थ नहीं किया है। अन्यत्र भी ऐसे अवसरंपर यही स्थिति समझनी चाहिए ।
जैसा कि आगे जा कर विस्तारसे कहा जायगा, दोष, धातु-उपधातु तथा मलके समुदायसे यह शरीर बना है। शरीरमें प्रत्येकके अमुक-अमुक प्रकृति-नियत गुण-कर्म हैं। इन गुण-कमोंके सम्पादनके लिये प्रत्येकका अमुकं निश्चित प्रमाणमें रहना आवश्यक है।
प्रत्येक जब इस निश्चित प्रमाणसे न अधिक होता है न न्यून, किन्तु यथायोग्य प्रमाणमें होता है, तभी अपने प्रकृति-नियत, शास्त्र प्रतिपादित गुणे-कमका निर्वाह समुचित रूपमें कर सकता है।
दोषादि जब अपने यथायोग्य प्रमाणमें होते हैं तो उन्हें 'सम' या 'प्राकृत' कहा जाता है, तथा उनकी इस स्थितिको 'समता' या 'साम्य' कहते हैं। इनमें कोई भी अपने शास्त्रोक्त कमको भले प्रकार कर रहा हो तो कह सकते हैं कि वह समावस्था में है। दोषादिकी समावस्था स्वास्थ्यमें होती है। अथवा यों कहना चाहिये कि,
इनकी समावस्था ही स्वास्थ्य है । दोषादिको समतासे भिन्न अवस्थाको 'विषमता' या 'वैषम्य' कहते हैं। इसमें दोप या तो वृद्धिको प्राप्त ( प्रकुपित ) हुए होते हैं या क्षीणता अर्थात् हासको प्राप्त हुए होते हैं। ये जब प्रकुपित होते हैं तो अपने प्रकृति-नियत गुण-कंमको अधिक मात्रामें करने लगते हैं, जिससे शरीर आगे कहे जानेवाले प्रकारसे विकारग्रस्त (रोगी) होता है। ये ही जय क्षीण होते हैं तो उनके स्वाभाविक गुणे-कर्म न्यून मात्रामें होते हैं, जिससे शरीरमें तत् तत् विक्रिया होती है। शरीरमें दोपादिकी विषमता ही रोगोंकी जननी है ।
दोषादिके गुण-कर्मोकी स्वाभाविकता, वृद्धि या क्षीणतांको देखकर वैद्यको उनके अनुक्रम समता, प्रकोप और क्षयको अनुमाने करना चाहिये। इसके अनन्तर, योग्य उपचारसे सम दोपादि साम्यकी रक्षा, प्रकुपित उनका क्षय तथा हासित हुए उनकी वृद्धि करनी चाहिये । यही क्षेपमें आयुर्वेदिक चिकित्साका मूल है । इस विवेचनसे स्पष्ट है कि दोषादिके सम्बन्धमें इतिकर्तव्यता प्रारम्भ करनेके पूर्व वैद्यको उनकी तीनों अवस्थाओंका विशद ज्ञान होना चाहिये। तीनों अवस्थाओं में भी वृद्धि और क्षयके
लक्षणों अर्थात् विकृति-लक्षणोंके ज्ञान समावस्था के लक्षणों अर्थात् प्रकृति लक्षणों के ज्ञान द्वारा सुगम और सम्यक हो जाता है। कारण, अपने नित्यके अनुभवसे प्रकृति लक्षणोंका ठोक-ठीक परिचय वैद्य की हो जाय तो वह इन लक्षणों में अल्प मात्र भी विपरीतता देखते ही जान सकता है कि शरीर में कोई-न-कोई विकार उत्पन्न हुआ है।
Book description of Kriya Sharir Book PDF free download in Hindi
- Author : वैध रणजितराय देसाई
- Subject : Kriya Sharir vigyan
- Course : BAMS
- Language : Hindi and Sanskrit
- Publisher : श्री वैद्यनाथ आयुर्वेद भवन लिमिटेड
- Pages : 960
- Pdf size : 47.3 MB
- Download availability : available for all
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